क्या अनामिका बापस आएगी? पार्ट – 26 लास्ट पार्ट

पार्ट - 26 (लास्ट पार्ट )

by Sonal Johari

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Summery

वो सबके बीच आ गई नाचते नाचते . उसके पैर जादुई तरीके से थिरक रहे थे ..उनकी फुर्ती देखते ही बनती थी ..एक अजीब समा बंध गया था .. लोग उसे अपलक देख रहे थे .. और उसके नृत्य से मुग्ध होने लगे थे.. अब वो नाचते -नाचते अपनी सुध -बुध खो बैठी थी.. एक अनजाना डर मधुर के मन में कौंधा और अब तक उसके पैर जमीन से ऊपर उठ चुके थे ..

सूरज दौड़ते हुए अंकित के पास पहुंचा और उसका सिर अपनी गोद मे रख लिया फिर उसे हिलाते हुए

“अंकित …अंकित…तुम ठीक तो हो…आँखें खोलो अंकित”

नवीन पानी का गिलास उठा कर लाया और अंकित के मुंह पर छीटें मारते हुए

“अंकित …अंकित …..”

अंकित बिना आंखे खोले बड़बड़ाया “अ ना मि का ….अ ना मि का

सूरज ने सुलगती आँखों से इंस्पेक्टर नवीन की ओर देखा और गुस्से में बोला .

“क्या कहा था तुमने ? दोस्ती की खातिर तुमने तफ्तीश की ? यही ना?…ऐसे बताते हैं .दोस्त को ? जबकि पता है किस कदर दीवाना है ये अनामिका के लिए ….कोई इंसानियत भी है तुममे …या नहीं… कुछ हुआ ना इसे…तो बता रहा हूँ नवीन …सारी इंस्पेक्टरी भुला दूँगा मैं तुम्हारी …दूर हटो …”

नवीन को शायद अपनी गलती का एहसास था इसलिए कुछ नहीं बोला रास्ता देते हुए दूर हट गया …सूरज ने अंकित को उठाया और टैक्सी में लिटा कर हॉस्पिटल ले गया …डॉ ने बताया कि अंकित की बेहोशी की वजह ..कमजोरी और तनाव है …और अंकित को इंजेक्शन लगा कर थोड़ी देर हॉस्पिटल में रखा..फिर डिस्चार्ज कर दिया….सूरज …अंकित को उसके घर ले गया …जैसे ही अंकित अपने कमरे में पहुँचा बोला

“सूरज ..वो इंस्पेक्टर झुठ बोलता है “

सूरज भी बहुत थक गया था …बिस्तर पर लेटते हुए बोला .

“.तुम तय कर लो अंकित …मानना क्या है…”?

अंकित :-“मतलब “?

सूरज :-“मतलब ये कि एक बार कहते हो मुझे किसी के कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता… फिर जब कोई कुछ बोलता है तो तुम अपना होश खो बैठते हो …बच्चा -बच्चा जानता है कि नवीन पाँच सौ रुपये तक मे बिक सकता है…फिर उसके बोलने से क्या फर्क पड़ता है “

अंकित :-“हाँ …सही कहते हो तुम “

लेटते हुए बोलता है .. और फिर जल्दी ही उसे नींद आ जाती है ….थोड़ी देर बाद ही उसे अपने माथे पर किसी के हाथ की छुअन का एहसास होता है,आंखे खोल कर देखता है .

“हे… ….अनामिका……….तुम….(आश्चर्य और खुशी से उसके मुँह से निकलता है और वो उठकर बैठते हुए) “कहाँ चली गयी थी तुम …तुम ठीक तो हो…कितना ढूंढा मैंने तुम्हें …

(वो उठी और बाहर चली गयी …अंकित उसके पीछे जाते हुए)

“कहाँ चली गयी थी …बताओ ना..मैं बता नहीं सकता …कितना खुश हूँ तुम्हें देखकर … “

वो पलटी और अंकित के गले लगकर बोली

“मैं भी बहुत खुश हूँ ..अंकित ..बहुत “

“तुम ठीक तो हो “

“हम्म”वो सिर हिलाकर बोली

“बताओ ना कहाँ चली गयी थी…जानती हो सब क्या कहते हैं”

“क्या “?

“.तुमने बताया नहीं ..कहाँ थी तुम ..जिस से भी पूँछा सब ये ही बोले कि तुम इस दुनियां में …खैर छोड़ो क्या फर्क पड़ता है ….तुम यहाँ तक कैसे पहुँची क्या आँटी ने दरवाजा खोला ..पता है वो भी यही कहती थी कि….मैं भी क्या बोले जा रहा हूँ …ये बताओ क्या राहुल ने तुम्हें…बस्स एक बार नाम बताओ तुम उसका … छोड़ूंगा नहीं ?

“अंकित …सही कहते हैं …लोग “

“क्या …क्या मतलब .”?

“मतलब ये …कि मैं जीवित नहीं हूँ…”

“क्या …”(मुँह खोल कर ) क्या बाहियाद मजाक है ये “?

“मैं सच कह रही हूँ …अंकित …जब तुमने मुझे पहली बार देखा था …मैं तब भी जीवित नहीं थी …”

“क्या बकवास किये जा रही हो “

फिर उसने पास आकर अंकित के हाथों को पकड़ते हुए कहा

“मैं सच कह रही हूँ …अंकित”

अंकित:-“मेरा दिल बैठा जा रहा है …कह दो ये सब झूठ है”

अनामिका :-“काश होता… लेकिन सच है…बिल्कुल सच …”

अंकित:-“मैं कैसे मान लूं “

अनामिका :-” ऐसे, कि तुम्हारे सिवा किसी ने नहीं देखा मुझे…अगर जीवित होती तो सब देख पाते…उस बंगले में ना रह रही होती …जहाँ कोई देखना तक नहीं चाहता “

अंकित आँखे फाड़े और मुँह खोले उसे ताक रहा था ..बहुत देर चुप रहा फिर बोला :-

“वो …वो तुम्हारे पेरेंट्स का बाहर होना …”

अनामिका :-“झूठ था..वो हैं ही नहीं …हम सब एकसाथ ही मरे थे सामूहिक आत्महत्या में”

अंकित :-“क .क..कैसे ..”?

अनामिका :-“मेरे पिता जिनका नाम कन्हैया लाल था, उन्हें जुआं खेलने की लत लग गयी वो राव अंकल के यहाँ ही काम करते थे,सब अच्छा चल रहा था,लेकिन धीरे -धीरे वो कर्ज़ में डूबने लगे …प्रोपर्टी के नाम पर जो भी था सब बिक गया… लेकिन उनकी आदत नहीं छूटी ..हमारा घर, वो बंगला, जहाँ तुम आते रहे …वो भी गिरवीं रख गया…राव अंकल से भी उन्होंने लोन लिया था..लेकिन कर्ज़ सिर के ऊपर हो गया था..उनकी इस हालत का पता राहुल को लग गया था…उसकी कुछ माफिया लोगों से जान पहचान थी …जिससे मेरे पिता को और पैसा उधारी पर मिल गया….इस सिलसिले में उसका घर आना -जाना भी हुआ ….फिर ….

अंकित :-“फिर “?

अनामिका:-“फिर एक दिन वो मेरे घर से जाने के लिए निकल रहा था और में कॉलेज से घर आ रही थी …तभी उसने मुझे देखा…… उसने मेरे पिता से कहा कि वो शादी करना चाहता है मुझसे ,जब उन्होंने मना किया तो उसने मेरे पिता की सच्चाई सबके सामने लाने की धमकी दी साथ ही जो पैसों की मदद की थी मेरे पिता की, उसका दबाव भी डाला, मेरे पिता इस सबसे बाहर निकलने का उपाय सोच ही रहे थे कि एक दिन…एक दिन वो राव अंकल के साथ घर आ गया ..राव अंकल ने ..राहुल के लिए मेरा हाथ माँगा..मेरे पिता जानते थे राहुल अच्छा लड़का नहीं है ..मेरे लायक नहीं है…लेकिन वो राहुल के सामने लाचार थे..और राव अंकल की बहुत इज़्ज़त करते थे …मैंने उस वक़्त उन्हें अकेले में ले जाकर कहा

“ना तो मैं अभी शादी के लिए तैयार हूँ… नाही राहुल को पसंद करती हूँ” उस दिन उन्होंने मुझे अपनी मजबूरी बताई और उनकी बात मानने की प्रार्थना की …साथ ही कहा कि वो जल्दी ही इस समस्या का कोई हल निकालेंगे ..और मेरी शादी उससे नहीं होने देंगे बस्स अभी हाँ कर दूँ …मैं कैसे इनकार करती ? …राव अंकल अपने साथ दो अंगूठी लाये थे ..वहीँ हमने एकदूसरे को अंगूठियां पहना दी…(सुबकने लगती है )

अंकित :-“.(दाँत भीचते हुए ) तभी …तभी …उसने कहा कि …..मक्कार कहीं का “

अनामिका :-“फिर उस दिन के बाद वो जब तब मुझसे राह चलते बात करने की कोशिश करता या हक जमाते हुए घर आ जाता …लेकिन मुझे उससे एक शब्द बोलने का भी मन ना करता…उल्टा दिन रात मैं परेशान रहने लगी …वो शादी के लिए मेरे पिता और मुझ पर दवाव बनाने लगा ..जब इससे भी बात ना बनी तो …उसके कहने पर वो गुंडे मेरे पिता को धमकाने लगे ..सारे दिए गए कर्ज़ की मांग करने लगे …फिर …फिर …कोई उपाय ना मिलने से मेरे पिता इतने हताश हो गए..कि एक शाम बाज़ार से खाना लाये उसमे जहर मिलाया …मुझे और मेरी माँ को खिला दिया …उसके बाद अपनी मजबूरी बताई…राहुल से मेरी शादी हो उससे अच्छा उन्होंने मेरा जाना बेहतर समझा …और बाद में खुद भी वही खाना खाकर अपनी जान दे दी ….एकसाथ तीन मौतों वाला मेरा प्यारा घर हॉन्टेड बंगला ‘बन गया …..”

अपनी पूरी बात कहने के बाद वो चुप हो गयी …और अंकित भी फिर कुछ याद करते हुए बोला

“बहुत बुरा हुआ तुम्हारे साथ …बहुत बुरा …(गुस्से में ) मैं राहुल को छोडूंगा नहीं “

अनामिका :-“उसकी कोई जरूरत नहीं “

अंकित :-“क्यो”?

अनामिका :-“वो जुर्म के रास्ते इतना बढ़ चुका है..कि हर दिन तिल -तिल मर रहा है…उसे उसके किये की सज़ा खुद ही मिल रही है.. नहीं तो मैं उसे जरूर मार देती”

अंकित :-“(कुछ याद करते हुए )तो फिर एक बात बताओ..राखी .राखी को तुमने ही मारा ना”?

अनामिका:-“नहीं .तुमसे उसकी बहुत तारीफ सुनी थी…इसीलिए मैं उसे देखने जरूर गयी थी ..लेकिन उसकी मौत में मेरा कोई हाथ नहीं ,कार्डियक अटैक से मौत हुई थी उसकी “

अंकित :-“रुचिका …क्या उसके एक्सीडेंट में तुम्हारा हाथ था”?

अनामिका :- ( हामी में सिर हिला देती है )

अंकित :-“क्यों किया तुमने ऐसा… वो आज ना जीवित है ना मरी हुई है…क्या बिगाड़ा था उसने तुम्हारा..बोलो …”

अनामिका :-“मैं उस वक़्त तुम्हारे साथ ही थी एक साये की तरह ..रुचिका स्कूल के समय मेरी क्लासमेट रह चुकी थी..और अंत तक मेरी अच्छी दोस्त बनी रही थी …कोई जाती दुश्मनी नहीं उससे मेरी..लेकिन उस दिन..सही वक्त पर अगर उसका एक्सीडेंट ना होता तो वो शायद मेरे बारे में तुम्हें सब बता देती ..मैं तुम्हें किसी कीमत पर खोना नहीं चाहती थी..

सामने से आ रहे ट्रक की स्पीड को मैंने ही बढाकर उसे रुचिका की कार से टकरा दिया था…”

अंकित :-(गुस्से में ताली बजाते हुए )” क्या बात है…फिर मुझे क्यों नहीं मार दिया..हाँ …मुझे मारने का तो ये नायाब तरीका निकाला ना तुमने…जीते जी मारने का इससे बेहतर तरीका क्या हो सकता है ..प्रेम का नाटक किया मेरे साथ ..मतलब जब मैं बेवकूफ अपनी मन की बातें किया करता था तुमसे..तब ..तब तुम तो मेरा मजाक बनाती होगी ना ..अररे क्या बिगाड़ा था मैंने तुम्हारा.मुझे ही क्यों चुना तुमने..(चीखते हुए ) बोलो”?

अनामिका:-“तुम्हें तब देखा था जब तुम बस से उतरे थे ,यहाँ आये थे..अपनी माँ के गम के डूबे हुए …मुझे मेरे जैसे लगे थे..लेकिन मैं तो भटकती हुई महज एक आत्मा थी ..जैसे ही ये बात याद आयी ..मैंने देखकर भी अनदेखा कर दिया तुम्हें.. फिर उस दिन जब तुम अपने घर के बाहर, बेघर बैठे थे..ना तो तुम्हारे पास एक रुपया था..ना ही खाने का ठिकाना ..तब मैं खुद को नहीं रोक पायी.और.तुम्हारे सामने आ गयी …जैसे मैं भटक रही हूँ.. वैसे ही मेरे पेरेंट्स भी ..उन्होंने बहुत मना किया मुझे …लेकिन तुम्हारा दुख नहीं देखा गया मुझसे …उस दिन जब तुमने मेरे घर पर कुछ आवाजे सुन कर एक कमरे का दरवाजा खोल दिया था ..तुमने उनकी ही आवाजे सुनी थी …

अंकित :-“ओह्ह …( निढाल सा अंकित जमीन पर बैठ गया )

अनामिका :-“अंकित …रुचिका की फिक्र मत करो …जल्दी ही होश आएगा उसे…वो ठीक हो जाएगी “

अंकित :-” तुम्हें कैसे पता …(फिर सर पर हाथ मारते हुए) ओह्ह मैं तो भूल गया था.कि तुम तो ..तुम तो …(उसकी आँखों से आंसू बह निकले )

अनामिका :-“भविष्य नहीं देख सकती मैं…बस्स कुछ ऐसे परिवर्तन देखे हैं उसमे ..जो अभी कोई और नहीं देख पाया है”

अंकित :-“अच्छा ..एक बात बताओ ,तुम अपने बारे में.. … पहले ना सही …कम से कम तब तो बता ही सकती थी जब मैं तुमसे प्यार करने लगा था…”

अनामिका:-“शुरुआत में .. तुम्हें मार कर अपने साथ ले जाना चाहती थी ..लेकिन उस दिन तुम्हें, तुम्हारी माँ ने बचा लिया …और वक़्त बीतने के साथ मैं खुद तुमसे गहराई से प्रेम करने लगी …और ऐसा नहीं कर पाई …मैं तुम्हें खोना भी नहीं चाहती थी …जानती थी जिस दिन ,तुम्हें मेरी सच्चाई का पता लगेगा ..उस दिन मैं तुम्हें और तुम्हारे प्यार ,दोनों को खो दूँगी …”

अंकित:-“अच्छा ..इतना ही प्रेम करने लगी थी तो बिना बताए क्यों छोड़ गयी…बोलो ..तब नहीं आया मेरा ख्याल”?

अनामिका:-“आया था ..लेकिन जब तुमने वो उदाहरण देकर मुझसे पूछा ‘कि कोई अमीर और संपन्न घर का लड़के से मेरे पेरेंट्स मेरी शादी करना चाहें तो क्या करूँगी ” उसी दिन समंझ गयी थी मैं… जल्दी ही तुम मेरी सच्चाई जानने वाले हो ..मैं उस पल का सामना नहीं करना चाहती थी..जब तुम मुझे छोड़ देते…लेकिन…

अंकित:-“लेकिन ..क्या”?

अनामिका:-“लेकिन ये… कि हर किसी ने तुम्हें मेरे बारे में बताया,इसके बाबजूद …ना तो तुम्हारा प्यार मेरे लिए कम हुआ…ना ही विश्वास ..तुम्हारे इतने प्यार को देखकर ही तो आयी हूँ अंकित …नहीं रहा गया मुझसे”

दोनों कुछ देर चुप रहे फिर एकाएक अंकित जोश में आते हुए बोला

“ठीक है …यही सही ..प्यार है …तो है …जैसे तुम तब थी अब भी वैसे ही रहो ..संभाल लूँगा मैं सब …किसी को कुछ नहीं बताऊँगा …जरूरत भी क्या है बताने की”?

अनामिका:-(दुखभरी आवाज में ) काश ! ऐसा हो पाता ?

अंकित :-“अब इसमें क्या दिक्कत है ..पहले भी तो रह रही थीं ना ,बल्कि अब तो और भी अच्छा है तुम्हें उस बंगले में रहने की भी जरूरत नहीं है,जो उस डरावनें जंगल में बना है”

अनामिका-“वो मेरा प्यारा घर है अंकित…लोग जो सोचते और देखते हैं वो उनके मन की धारणा है..”

अंकित :-“ठीक है ..बापस लेता हूँ अपने शब्द…जहाँ ठीक लगे तुम्हें वही रहो ..लेकिन बनी रहो मेरी जिंदगी में…मैं छोड़ दूँगा ये शहर,राव सर की नौकरी ..सब ..बस्स तुम बनी रहो “

अनामिका:-“नहीं अंकित …अब संभव नहीं …अब नहीं रह सकती पहले की तरह ..तुम्हारे बेशुमार प्यार और विश्वास की खातिर ..और तुमने ये जो हालत कर ली है अपनी, उसकी खातिर ही तुम्हें सच बताने आयी हूँ बस्स… मुझे जाना होगा “

अंकित :-(आगे आकर अनामिका का हाथ कसकर पकड़ते हुए) “नहीं जाने दूँगा मैं तुम्हें …हरगिज नहीं “

अनामिका :-“समझो ना अंकित …अब सब तो है तुम्हारे पास .. सूरज जैसा जान लुटाने वाला दोस्त ,सरोज जैसी माँ..इतनी अच्छी नौकरी, राव सर का तुम पर विश्वास …जानते हो …रुचिका केस से तुम्हें बचाने के लिए उन्होंने नवीन को रिश्वत तक दी है …अंकित सब कुछ तो है तुम्हारे पास …जल्दी ही मुझे भी भूल जाओगे …सब ठीक हो जाएगा”

अंकित :-“क्या…राव सर ने मुझे बचाने की खातिर नवीन को रिश्वत दी थी “

अनामिका -:”हाँ …”

अंकित :-“..मैं उनकी लम्बी उम्र की कामना करता हूँ….लेकिन सुनो अनामिका …ये सब तुम्हारा ही दिया हुआ है …मैं तो जैसे मरा ही हुआ था … ना तुम आती…ना मैं जिंदा होता..ना नौकरी करता ना उत्साह आता…या तो तुम …या कुछ नहीं…. कोई उपाय तो होगा …..मैं एक पल भी तुम्हारे बिना जीना नहीं चाहता…कुछ करो ना …प्लीज़ “

अनामिका :-“एक उपाय है “

अंकित :-“(उत्साहित होकर ) .जल्दी बोलो .. क्या उपाय है “

अनामिका:-“मैं तुम्हारी दुनिया मे नहीं आ सकती लेकिन तुम मेरी दुनिया मे आ सकते हो”

अंकित :-“ठीक है ..बल्कि बहुत ठीक है …”

अनामिका :-“सोच लो …अंकित …जान दे पाओगे अपनी “.?

अंकित :-“अब भी यकीन नहीं तुम्हें मुझ पर..मेरी जान तुममे बसती है..वो दुनिया जहाँ तुम नहीं हो …वो तो वैसे भी नर्क है मेरे लिए ..(फिर मुस्कुराते हुए ) बस्स इतना करना कि मरते वक्त दर्द ना हो…एक पल भी आँखों से ओझल मत होना ..ले चलो अपने साथ “

उसी समय सूरज उसे पुकारता हुआ बाहर आया,ठिठक कर रुक गया .उसे देख अंकित बोला

“अनामिका …मैं सूरज से तुम्हें मिलवाना चाहता हूँ…ये पागल जान दिए मरा जाता है मुझे …बहुत खयाल रखा इसने मेरा ..और जानती हो तुम्हें भाभी भी बुलाता है “

सूरज आँखे फाड़े कभी शून्य में उस ओर देखता जिस ओर मुँह करे अंकित बात कर रहा था…तो कभी अंकित की ओर …उसे कुछ ना दिखा… तो अंकित से बोला

” किससे बात कर रहे हो ..कोई तो नहीं यहाँ …और …”

बात पूरी भी ना कर पाया था कि वो झिलमिलाती सफेद ड्रेस में उसके सामने मुस्कुराती हुई खड़ी हो गयी ,सूरज ने बार -बार अपनी पलकें झपकाई और वो अवाक सा उसकी ओर देखने लगा …वो बोली

“सूरज …तुमने मेरे अंकित का बहुत ख्याल रखा ..इसलिए जल्दी ही तुम्हारी जिंदगी खुशियों से भर दूँगी मैं”

सूरज के मुँह से कोई शब्द नहीं निकला ..अंकित उसके पास आया और उसे गले लगाते हुए बोला”कहा था ना,सबसे पहले तुमसे मिलवाऊंगा..ये अनामिका,तुम्हारी भाभी..है ना खूबसूरत “

मुँह खोले सूरज अब भी अवाक ही ख़ड़ा था ..अंकित की बात सुन उसने स्वीकृति में बस्स सिर हिला दिया ..अनामिका ने अपना हाथ अंकित की ओर बढ़ाते हुए कहा “चलें “

अंकित ने “हम्म “कहते हुए अपना हाथ उसके हाथ पर रख दिया ..वो तेज़ी से आगे बढ़े ..छत के कोने तक जैसे ही अंकित पहुंचा …सूरज जैसे अपने होश में आया तेज़ी से उसका नाम पुकारते हुए, उसकी और दौड़ा ….

उसी पल…अनामिका ने अंकित को हवा में उछाला.. और वो जमीन पर जा गिरा वो उसके पास गई .. हाथ बढ़ा कर उसे पकड़ा और दूर आसमान में ले गयी …अंकित ने पूछा

“क्या ..मै अब भी जीवित हूँ “? अनामिका ने मुस्कुराते हुए जमीन की ओर उँगली से इशारा किया ..जहाँ अंकित का मृत शरीर पड़ा था…..और उसके सिर से खून बह रहा था ..

सूरज ने जब अंकित को नीचे पड़ा देखा तो भागते हुए नीचे भागा.. उसे भागते देख सरोज और घनश्याम भी बाहर की ओर दौड़े ..अब वो अंकित के मृत शरीर के पास खड़े थे ..आस पास के लोग भी जुटने लगे थे …

अंकित ने मुस्कुराते हुए अनामिका की ओर देखा और कहा

“अब हमें कोई अलग नहीं कर सकता अनामिका .. कोई नहीं”

अनामिका ने भी मुस्कुराते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया और अंकित के गले लग गयी !

●●●●●●●●【 समाप्त 】 ●●●●●●●●

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